Sunday, May 30, 2010

" पश्चाताप "

अपनी ही नज़र मे गिर गया हूँ इस कदर
लगता है अब न शायद उठ पाऊँगा
खुद को ही माफ़ नहीं कर पा रहा हूँ
दूसरा क्या मुझे माफ़ कर पायेगा

भूल वो हो गयी है मुझ से भूल से 
भूलना चाहूँ भी तो नहीं भूल पाऊँगा
अच्छा सबक दिया है ऐ जिंदगी तू ने
 खुशियाँ दी तो, गम भी दिये तू ने
पाठ वो पढाया जो न भूल पाऊँगा

पास जिस को चाहता हूँ अपने  हर पल  में
उस के दूर जाने का ख्याल भी न ला पाऊँगा  
 अनजाने मे इतनी चोट दी है खुद को
 सोचता हूँ ये घाव कैसे, मैं भर पाऊँगा

नाजुक होते हैं ये दिल के  रिश्ते सभी
सोचा न था कि तेरी बेरूखी मे ये भी सीख जाऊँगा

मुझको अगर कोई उठा सकता है,मेरी नज़रों मे
तो वो तुम हो,तुम ही हो , सिर्फ तुम
उठा लो मुझे इस दर्द के दरिया से
वरना बिन मौत के ही मर जाऊँगा
होगा यूँ जिंदगी का सामना मुझसे
पता  नहीं था कि मौत मे जिंदगी पाऊँगा