मेरी मिटटी से भी खुश्बू ,मोहब्बत की आएगी
मेरी मोहब्बत , यूँ ही नहीं भुलायी जाएगी
सागर की गहराई क्या नापेगी इसे
ये तो पर्वतों से भी कहीं ज्यादा ऊंचाई पायेगी
मेरी मिटटी से भी खुश्बू ,मोहब्बत की आएगी
बन के खुश्बू ,यूँ महक जाऊँगा मैं
हर जिस्म हर सांस मे, यूँ खो जाऊँगा मैं
जुदा तुझको ,मुझसे कौन कर सकेगा भला
के मर कर भी ,यूँ अमर हो जाऊँगा मै
मोहब्बत की खुश्बू मे ,अमरता को यूँ पाऊँगा
एक क्या, कई जिश्मों मे समा जाऊँगा मैं
गुजरूँगा ,जिस राह से खुश्बू बनकर
मोहब्बत ही मोहब्बत महका जाऊँगा मैं
यूँ मेरी मिट्टी से खुश्बू मोहब्बत की आएगी
तुम ही बताओ क्या ये, यूँ ही भुला दी जाएगी
सागर की गहराई क्या नापेगी इसे
ये तो पर्वतों से भी ,कहीं ज्यादा ऊंचाई पायेगी
मेरी मिटटी से भी खुश्बू ,मोहब्बत की आएगी




