Sunday, May 30, 2010

" पश्चाताप "

अपनी ही नज़र मे गिर गया हूँ इस कदर
लगता है अब न शायद उठ पाऊँगा
खुद को ही माफ़ नहीं कर पा रहा हूँ
दूसरा क्या मुझे माफ़ कर पायेगा

भूल वो हो गयी है मुझ से भूल से 
भूलना चाहूँ भी तो नहीं भूल पाऊँगा
अच्छा सबक दिया है ऐ जिंदगी तू ने
 खुशियाँ दी तो, गम भी दिये तू ने
पाठ वो पढाया जो न भूल पाऊँगा

पास जिस को चाहता हूँ अपने  हर पल  में
उस के दूर जाने का ख्याल भी न ला पाऊँगा  
 अनजाने मे इतनी चोट दी है खुद को
 सोचता हूँ ये घाव कैसे, मैं भर पाऊँगा

नाजुक होते हैं ये दिल के  रिश्ते सभी
सोचा न था कि तेरी बेरूखी मे ये भी सीख जाऊँगा

मुझको अगर कोई उठा सकता है,मेरी नज़रों मे
तो वो तुम हो,तुम ही हो , सिर्फ तुम
उठा लो मुझे इस दर्द के दरिया से
वरना बिन मौत के ही मर जाऊँगा
होगा यूँ जिंदगी का सामना मुझसे
पता  नहीं था कि मौत मे जिंदगी पाऊँगा


 

Saturday, May 22, 2010

एक दिन यूँ जल जाऊँ मैं ….

एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ  मै ….
आरजू  है  तुझ मे मिल  जाऊँ मै ....
और...फिर .......
 तुझको   याद  आऊँ  मै  …
आंसुओं  की तलाश हो जो तुझे कभी ….
तेरे होंठों की हँसी बन के मुस्कुराऊँ मैं.....
एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ मैं   ….
इन हवाओं मे यूँ  मिल जाऊं मैं ....
साँस ले तू तो ....
तेरे दिल मे धड़क जाऊं मैं...
एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ मैं   …
छूना जो चाहे तू आसमान ..
तेरे कदमों की जमीं बन जाऊं मैं..
एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ मैं …
गर कोई ना हो दूर तक तेरे
शून्य  बन के तुझ पे छा जाऊं  मैं ...
एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ मैं   …
उजाले मिल सके जीवन मे तुझको..
इस आरजू मे आग बनकर जलूं  मैं...
एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ मैं   …
अपने  जलने का सही सबब पाऊँ मैं ....
एक  दिन  यूँ   जल  जाऊँ मैं   ….

Sunday, May 17, 2009

तेरे ख्याल से

तेरे ख्याल से दीवाने बाज़ आ न सके
गए वहां तक जहाँ ख्याल आ न सके
मुझ को जब चैन से सोने न दिया दुनिया ने
कब्र मे जा के सोया की कोई जगा न सके

Friday, May 15, 2009

मेरा परिचय

चल पड़ा हूँ गीत गाता इस नए संसार मे
आओ शंकर दो सहारा नाव है मझदार मे

आधुनिक नारी

जो सजाया गया रूप को इस तरह
क्या नुमाइश का ये कोई सामान है

रूप का गर्व क्या दो दिनों के लिए
रूप तो एक रंगीन मेहमान है

ये तो कहना तुम्हारा निराधार है
एक भोंरा कलि को सताया करे

ये सुनहली सुनहली लटें खोल कर
दे निमंत्रण समां तो शलभ क्या करे

नय्लोनी अदा रेशमी बांकपन
ये लिपिस्टिक है या आबरू का लहू

आ गई है यहाँ पश्चमी ये हवा
तुम उडी जा रही हो पवन की तरह

भाइयों की कमी न खलेगी तुम्हे
पहले चलना तो सीखो बहन की तरह

जो सजाया गया रूप को इस तरह
क्या नुमाइश का ये कोई सामान है

Wednesday, May 13, 2009

हसरत ऐ दिल ....लहू लुहान बाकी है .....

हसरते दिल ....लहू लुहान बाकी है .....
सब्र का एक और इम्तिहान बाकी है .....
टूटे फूटे ही सही इन कांच के प्यालों मे
बूँद भर ही सही कुछ तो जान बाकी है ....
अभी तो खुले होंगे मैकदों के दरवाजे ....
अभी तो होनी सुबह की आजान बाकी है .....
हसरते दिल ....
लहू लुहान बाकी है .....
कौन कहता है कि मेरा कोई सरपरस्त नही
अभी तो मेरे सर पे आसमान बाकी है.....
कह दो इन आकाश के उड़ते परिंदों से
अभी तो मेरी असली उड़न बाकी है
हसरते दिल ....
लहू लुहान बाकी है .....